प्राण ऊर्जा केवल जीवन काल तक ही सीमित नहीं रहती- योगेश गहतोड़ी
भावपल्लवन
श्लोक:-
धनञ्जयो मृते देहे स्थित्वा देहं न मुञ्चति।
सर्वावयवसंयुक्तः शवदेहेऽपि तिष्ठति॥
— गरुडपुराण, आचारकाण्ड 231.13
(धनञ्जय उपप्राण मृत्यु के बाद भी देह में स्थित रहता है और शव को त्वरित विघटन से बचाता है।)
यह श्लोक गरुड़पुराण (आचारकाण्ड 231.13) धनञ्जय उपप्राण की विशिष्ट भूमिका को उजागर करता है। वैदिक प्राण-विज्ञान के अनुसार, मृत्यु के पश्चात भी धनञ्जय उपप्राण कुछ समय तक देह में स्थित रहता है, जिसके कारण शव के सभी अंग-प्रत्यंग अपनी स्थिर स्थिति बनाए रखते हैं और तत्काल विघटन आरंभ नहीं होता। इसका अर्थ यह है कि प्राण-ऊर्जा केवल जीवनकाल तक सीमित नहीं रहती, बल्कि देह के निःश्वास के बाद भी सूक्ष्म रूप में सक्रिय रहती है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक प्राण और चेतना के गहन रहस्य को प्रकट करता है, वहीं आयुर्वेदिक दृष्टि से यह शव-संरक्षण की प्राकृतिक प्रक्रिया का आधार समझाता है।
प्रकृति के आपसी सम्बन्ध को भी उजागर करता है
गरुड़पुराण का आचारकाण्ड धर्मशास्त्रीय और दार्शनिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण खण्ड है, जिसमें जीवन के आचरण, संस्कार, प्रायश्चित्त, दान, यज्ञ-विधि तथा मृत्यु और परलोक से सम्बन्धित रहस्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। यह खण्ड मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों के समन्वय से जीवन यापन करने का मार्गदर्शन देता है। आचारकाण्ड केवल मृत्यु के बाद की प्रक्रियाओं और प्राण-तत्त्वों (जैसे धनञ्जय उपप्राण) के सूक्ष्म रहस्यों को स्पष्ट नहीं करता, बल्कि जीवात्मा की यात्रा और शरीर-प्रकृति के आपसी सम्बन्ध को भी उजागर करता है।
पाँच उपप्राणों में धनञ्जय का स्थान विशेष और अंतिम
नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनञ्जय इन पाँच उपप्राणों में धनञ्जय का स्थान विशेष और अंतिम माना गया है। नाग उपप्राण डकार और वमन जैसी शारीरिक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करता है, कूर्म उपप्राण नेत्रों की पलक झपकने की क्रिया का संचालन करता है, कृकल उपप्राण छींक और खाँसी जैसी स्वाभाविक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करता है और देवदत्त उपप्राण जंभाई और निद्रा जैसी क्रियाओं के लिए जिम्मेदार है। इन चारों के बाद धनञ्जय उपप्राण अंतिम और विशेष स्थान रखता है, क्योंकि इसका कार्य प्राण-तत्त्व की निरंतरता को जीवन और मृत्यु की सीमा तक बनाए रखना है। यह केवल सांस लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि शरीर और चेतना के बीच सूक्ष्म स्तर पर गहरा संबंध स्थापित करता है और मृत्यु के समय भी शरीर में स्थिर रहकर देह के त्वरित विघटन को रोकता है।
धनञ्जय उपप्राण का मुख्य कार्य मृत्यु के बाद भी कुछ समय तक देह में स्थिर रहकर शरीर के अंग-प्रत्यंग को विघटन से बचाना है, जिससे शव अपनी आकृति और कठोरता बनाए रखता है। इसकी विशेषताएँ हैं—अविचल स्थिरता, अंगों का संयोजन बनाए रखना और मृत्यु उपरांत भी देह में सक्रिय रहना। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति के देह त्यागने के बाद भी उसका शव तुरंत सड़-गलना नहीं शुरू होता; यह स्थायित्व धनञ्जय उपप्राण की उपस्थिति का प्रभाव है।
प्राण केवल श्वास-प्रश्वास का नाम नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म ऊर्जा
आध्यात्मिक दृष्टि से मृत्यु के पश्चात देह में होने वाले परिवर्तन केवल भौतिक विघटन नहीं हैं, बल्कि यह चेतना और प्राण-तत्त्व के गहन रहस्यों का संकेत भी हैं। वैदिक और उपनिषद परंपरा के अनुसार, मृत्यु के समय मुख्य प्राण शरीर को छोड़ देते हैं, लेकिन धनञ्जय उपप्राण कुछ समय तक देह में स्थिर रहता है और शरीर को संतुलन एवं स्थायित्व प्रदान करता है। यह स्मरण कराता है कि प्राण केवल श्वास-प्रश्वास का नाम नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म ऊर्जा है जो शरीर और आत्मा के बीच गहरा संबंध स्थापित करती है। जैसे-जैसे प्राण-ऊर्जा पूरी तरह से निवृत्त होती है, शरीर धीरे-धीरे पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश में विलीन होने लगता है, जिसे पंचत्व प्राप्त होना कहा जाता है।
धनञ्जय उपप्राण शव के अवयवों में शेष ऊर्जा-संतुलन और सूक्ष्म संचार बनाए रखता है, जिससे शरीर तुरंत सड़न या विघटन का शिकार नहीं होता। यही कारण है कि शव की कठोरता (Rigor Mortis) और संरचना बनी रहती है, जिससे अंतिम संस्कार या दफनाने तक पर्याप्त समय प्राप्त होता है। यह उपप्राण प्राण-ऊर्जा और पंचमहाभूतों के बीच सेतु का कार्य करता है; देह और आत्मा के पृथक्करण के बाद भी यह प्रकृति को क्रमिक और संतुलित परिवर्तन का अवसर प्रदान करता है।
धनञ्जय उपप्राण का मृत्यु के बाद भी देह में कुछ समय तक स्थिर रहना कठोपनिषद (2.18) और भगवद्गीता (2.20) में वर्णित आत्मा-अविनाशी दृष्टिकोण से साम्य रखता है।
“यथैवार्ण्यं वैद्यं पुनः पश्यति नास्ति परं तत्”
— कठोपनिषद 2.18
अर्थ: जिस प्रकार एक ज्ञानी व्यक्ति अपने शरीर और अनुभवों से परे, आत्मा की शाश्वतता को देखता है, वैसे ही प्राण और चेतना भी शरीर के नाश के बाद स्थायी रहते हैं।
न जायते म्रियते वा कदाचि। नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो, न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
— भगवद्गीता 2.20
अर्थ: आत्मा न तो जन्म लेती है और न ही कभी मरती है; वह शाश्वत, अजन्मा, अविनाशी है और शरीर के क्षय या विनाश से अप्रभावित रहती है। यही जीवन और मृत्यु के प्रति वैदिक दृष्टिकोण की गहन सच्चाई है कि शरीर क्षणिक और नश्वर है, पर आत्मा स्थायी और शाश्वत रहती है।
प्राण अनादि और अनंत
वैवैदिक परंपरा के अनुसार प्राण अनादि और अनंत है, क्योंकि यह स्वयं ब्रह्म की अभिव्यक्ति है। प्रश्नोपनिषद (2.13) में कहा गया है कि “सर्वं प्राणायै धारणं जगत्।”प्राण ही संपूर्ण जगत का आधार है और सभी जीवों में जीवन की शक्ति प्रदान करता है। योग और ध्यान की परंपरा में प्राण को ब्रह्म से एकरूप अनुभव करना मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग माना गया है।
भारतीय दर्शन मृत्यु की अनिवार्यता को स्वीकार करता है, फिर भी चेतना की निरंतरता पर विशेष बल देता है। धनञ्जय उपप्राण का मृत्यु के बाद भी देह में कुछ समय तक सक्रिय रहना इस सत्य का प्रत्यक्ष उदाहरण है। यह संकेत देता है कि जीवन का सार केवल भौतिक शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि चेतना का प्रवाह मृत्यु के पार भी जारी रहता है।
अन्त्येष्टि संस्कारों में धनञ्जय उपप्राण का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान
अन्त्येष्टि संस्कारों में धनञ्जय उपप्राण का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। मृत्यु के तुरंत बाद यह उपप्राण शव को व्यवस्थित रखने और अंग-प्रत्यंग की स्थिरता बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाता है। यही कारण है कि शव तुरंत सड़-गलने से बचता है और संस्कार के लिए समय मिलता है। अन्त्येष्टि की क्रियाएँ जैसे मंत्रोच्चारण, अग्नि-संस्कार, पिण्डदान आदि इस संक्रमणकाल को पवित्र, सुरक्षित और संतुलित बनाने के लिए की जाती हैं।
मृत्यु की निस्तब्ध साँझ में, जब शरीर में श्वास-प्रश्वास का संगीत थम जाता है, तब भी एक सूक्ष्म स्पंदन देह के द्वार पर पहरा देता है, उसे धनञ्जय उपप्राण कहा जाता है। यह अंतिम प्रहरी की भाँति अंग-प्रत्यंग को विघटन के वेग से बचाए रखता है और शव की स्थिरता बनाए रखता है। मृत शरीर की नीरवता में भी इसकी मौन उपस्थिति यह संदेश देती है कि जीवन का सार केवल भौतिक क्रियाओं में नहीं है, बल्कि अदृश्य चेतना और प्राण-ऊर्जा का अनवरत प्रवाह है।
शव में स्थित धनञ्जय उपप्राण की स्थिरता जीवन के स्थायित्व और अनश्वरता का प्रतीक है। यह स्मरण कराता है कि जीवन का सार केवल शरीर की गति या भौतिक क्रियाओं में नहीं है, बल्कि उस अदृश्य चेतना में निहित है जो न जन्म से बँधी है और न मृत्यु से समाप्त होती है।
गरुड़पुराण का समग्र संदेश यह है कि जीवन और मृत्यु दोनों ही ब्रह्मांडीय नियमों के अधीन हैं। मनुष्य का प्रमुख कर्तव्य यही है कि वह धर्म, करुणा, संयम और सदाचार का पालन करते हुए अपने कर्मों को शुद्ध और सात्त्विक बनाए रखे। जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक सुख या संयोग नहीं, बल्कि चेतना और प्राण के माध्यम से ब्रह्म की दिव्यता और अनन्तता को जानना और अनुभव करना है।
धनञ्जय उपप्राण जीवन और मृत्यु के चक्र में एक सूक्ष्म दार्शनिक संकेत प्रस्तुत करता है। यह संकेत हमें यह समझने में सहायता करता है कि मृत्यु केवल शरीर का अंत है, चेतना का नहीं। जीव की वास्तविकता न केवल स्थूल और नश्वर शरीर में निहित है, बल्कि उसमें अनश्वर चेतना और प्राण-तत्त्व का स्थायी प्रवाह भी शामिल है। जीवन का सार नश्वर और अनश्वर तत्वों के संतुलित सह-अस्तित्व में निहित है, जहाँ शरीर क्षणिक है, पर चेतना और प्राण-ऊर्जा निरंतर और स्थायी रहती है। धनञ्जय उपप्राण इसी गहन सत्य का प्रतीक है, जो मृत्यु के समय भी देह में स्थिर रहकर जीवन और चेतना के वास्तविक स्वरूप का स्मरण कराता है।
✍️ योगेश गहतोड़ी

