नेपाल त्रासदी पर नदी का पक्ष रखती डा ललित योगी की कविताएं

1.नदी

2.मैं त्रिशूली हूँ!

पुराने पथ को नहीं भूलती,
तू समझा मैं भूल गई हूं।
हिमखंड पिघलते ऊंचाई से,
ग्लेशियर में उलझ गई हूँ।
मेरे पथ में रुकावट आये तो,
ताल बन उसमें पलती हूँ।
जब नहीं रुकता दबाव मेरा,
तब वेगवती हो जाती हूँ।
नहीं उजाड़ती घर तेरा मैं,
पर तूने ही मुझपर बनाये
गलती तेरी ही,तू ही दोषी
तूने शमशान बनवाये।।
मैं तो युगों से, ऐसे ही बहती,
मैंने नियम नहीं है तोड़ा।
तूने ही मेरे घर को,
अपना बनाकर है छोड़ा।
मैं कोसी, मैं हूँ गंडक
मैं गोला- त्रिशूली हूँ।
न छेड़ मुझे तू मनखी,
खबरदार! मैं नदी हूँ।

४. ऐसे ही समझाती हूँ!

मेरा भयावह रूप देखकर,
अब तो डरा ही तू होगा!
मेरे विकराल लहरों से तू,
कुछ तो सीखा ही होगा!

मैंने ही अपने पथ पर आये,
सैकड़ों घर उजाड़ दिए।
मैंने ही अपने पथ पर आये,
हजारों जीवन लील लिए।

मैं अपने ही रास्ते से जाती
फिर क्यों घर वहां बना दिए
मेरे रास्ते पर होटल-बंगले,
तूने क्यों सब वहां खड़े किए

भूगर्भीय हलचल होने से में,
नया रास्ता बना लेती हूँ।
युगों युगों से फिर लौटती,
अपना घर नहीं भूलती हूँ।।

अबके भी मैंने कई घर रौंदे,
और सबको मिट्टी मिला दिया।
अपना रूप विकराल कर,
देश-विदेश को दिखा दिया।।

नहीं समझती वेदना को,
मेरी बला से कई मरें।
में कहती मुझे न छेड़ो,
छेड़ें तो फिर सभी मरें।

यह रूप भी मेरा ही है,
में बहती शांत सरोवर हूँ।
क्रोध में आईं अगर तो,
में रौंदती त्रिशूली हूँ।

मेरा तुमसे द्वेष नहीं है,
बस तुमको ये बतलाती हूँ।
नहीं समझता मनखी तू,
फिर ऐसे ही समझाती हूँ।

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