पितृ पक्ष में अष्टमी व नौमी का श्राद्ब क्यों माना गया है अत्यधिक महत्वपूर्ण,जानें
पितृ पक्ष (सोल्ह श्राद्ब) पूर्णिमा से शुरु होते हैं और अमावस्या को इसका समापन होता है। हर साल भाद्रपक्ष में सोल्ह श्राद्ब व पितृ पक्ष एक बार आते हैं। हिंन्दू सनातन धर्म में जैसे अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।ऐसे ही साल में सोल्ह श्राद्ध व पितृ पक्ष भी एक महत्वपूर्ण पवित्र अनुष्ठानों में माना जाता है।
अष्टमी व नौवमी का श्राद्ब अत्यधिक महत्वपूर्ण
पौराणिक शास्त्रों के अनुसार अष्ठमी व नौवमी का श्राद्ब अत्यधिक महत्वपूर्ण है।अष्टमी को पिता का श्राद्ब,नौवमी को माता का श्राद्ध किया जाता है।
अष्टमी (पिता का श्राद्ध): इस दिन पिता की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध किया जाता है। यह दिन पिता के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है।
– नवमी (माता का श्राद्ध): इस दिन माता की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध किया जाता है। यह दिन माता के प्रति प्रेम, सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है।
इन दोनों दिनों पर श्राद्ध करने से पितरों को तृप्ति मिलती है और परिवार के सदस्यों को भी आध्यात्मिक लाभ और पितरों का आशीर्वाद मिलता है।
चतुर्दशी श्राद्ध उन पूर्वजों का किया जाता है।जिनका देहांत दुर्घटना आग,बाढ़, या किसी हत्या से हुआ हो ।वहीं
जिन पूर्वजों की देहांत कि तिथि मालूम नही हो उनका श्राद्ध व पिंड दान अमावस्या को दिया जाता है।
श्राद्ध कैसे मनाते हैं
एक दिन पहले उपवास रखा जाता है अगले दिन श्राद्ब के दिन पंडित को बुलाकर विधि विधान से अपने औसत अनुसार पंडित को कपडे़,चावल,दाल, दान दक्षिणा आदि देकर अपने पितरों का श्राद्ध किया जाता है।
