अमेरिका ने भारत पर 50% आयात शुल्क लागू किया

  • अमेरिका ने भारत पर 50% आयात शुल्क लागू किया।
  • मोदी बोले, स्वदेशी से किसान और छोटे उद्योग सुरक्षित रहेंगे।

अमेरिका ने भारत से आने वाले आयातित उत्पादों पर 50% तक का भारी शुल्क लागू कर दिया है, जिससे नई दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच चल रहे व्यापारिक तनाव ने नया मोड़ ले लिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस महीने की शुरुआत में इस कदम की घोषणा की थी और इसे रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखने पर भारत को दी गई सज़ा बताया था। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन शुल्कों का मकसद मॉस्को की तेल आय से होने वाली कमाई को कम करना और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को यूक्रेन युद्ध पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करना है। वहीं भारत ने इस फैसले को ‘‘अनुचित, अन्यायपूर्ण और अव्यवहारिक’’ करार देते हुए स्पष्ट कर दिया कि वह ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों पर समझौता नहीं करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद में सार्वजनिक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारत बाहरी दबावों को झेलेगा और किसानों, लघु उद्योगों तथा पशुपालकों के हितों की रक्षा करते हुए ‘‘स्वदेशी’’ को और मजबूती देगा।

अमेरिकी शुल्क लागू, व्यापार वार्ताएँ विफल

27 अगस्त सुबह 9:31 बजे भारतीय समयानुसार यह शुल्क आधिकारिक तौर पर लागू हो गया। पहले से लगाए गए 25% शुल्क पर अतिरिक्त 25% जोड़ दिए जाने के बाद कुल शुल्क अब 50% तक पहुँच गया है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग ने पहले ही एक नोटिस जारी कर स्पष्ट कर दिया था कि भारतीय उत्पादों के लिए यह शुल्क उन सभी वस्तुओं पर लागू होगा जो अमेरिका में उपभोग के लिए आयातित या गोदामों से निकाली जाएँगी।

यह फैसला भारत और अमेरिका के बीच कई महीनों तक चली पाँच दौर की व्यापार वार्ताओं के निष्फल रहने के बाद आया है। अमेरिका लगातार इस बात पर ज़ोर देता रहा कि भारत रूस से तेल की खरीद बंद करे, जबकि नई दिल्ली का तर्क रहा कि सस्ता रूसी तेल घरेलू महँगाई को नियंत्रित रखने और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी है। वैश्विक बाज़ार की अस्थिरता के बीच भारत के लिए यह रणनीति आवश्यक मानी गई।

नए शुल्कों का असर व्यापक होगा और कई भारतीय निर्यात उत्पाद अमेरिकी बाज़ार में महँगे पड़ेंगे। हालांकि, कुछ क्षेत्रों को इससे छूट दी गई है—जैसे मानवीय सहायता सामग्री, ट्रांजिट में भेजी गई खेप और परस्पर व्यापार समझौतों के तहत आने वाले उत्पाद। दिलचस्प रूप से, भारत के कुछ महत्वपूर्ण निर्यात क्षेत्र जैसे लोहे-इस्पात, एल्यूमिनियम, ताँबा, यात्री वाहन, हल्के ट्रक, ऑटो पार्ट्स, फ़ार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स (चिप्स, मोबाइल फोन, टैबलेट) इस अतिरिक्त 50% शुल्क से मुक्त रखे गए हैं।

फिर भी, अन्य अनेक उद्योगों के निर्यातकों को अमेरिकी ऑर्डरों में कमी की आशंका है। अमेरिका, यूरोपीय संघ के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सरकार ऐसे प्रभावित निर्यातकों को आर्थिक मदद देने और उन्हें चीन, लैटिन अमेरिका तथा मध्य पूर्व जैसे नए बाज़ारों की ओर मोड़ने पर विचार कर रही है।

यह पूरा विवाद महज़ व्यापारिक नहीं बल्कि भू-राजनीतिक भी है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के लिए व्यापार नीति को हथियार बनाना विदेश नीति उद्देश्यों को साधने की रणनीति का हिस्सा है। भारत जैसे रणनीतिक सहयोगी पर कठोर कदम उठाकर अमेरिका यह संदेश दे रहा है कि रूस पर लगाए गए उसके प्रतिबंधों को नज़रअंदाज़ करने वालों के लिए कोई छूट नहीं होगी। लेकिन इसका खतरा यह है कि जब दोनों देशों ने हाल ही में रक्षा साझेदारी के दो दशक पूरे किए और एक नए 10 वर्षीय ढाँचे पर काम शुरू किया, ऐसे समय में द्विपक्षीय संबंधों पर गहरी दरार आ सकती है।

ट्रंप ने सिर्फ़ भारत तक ही सीमित चेतावनी नहीं दी। उन्होंने डिजिटल टैक्स और डिजिटल सेवाओं के नियम लागू करने वाले देशों को भी धमकाया कि यदि ये ‘‘भेदभावपूर्ण’’ नियम वापस नहीं लिए गए तो उन देशों पर भी ‘‘अतिरिक्त भारी शुल्क’’ और अमेरिकी चिप तकनीक पर निर्यात प्रतिबंध लगाया जाएगा। यह रुख दिखाता है कि ट्रंप सिर्फ़ ऊर्जा या रूस तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि व्यापक स्तर पर टैरिफ़ को दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

मोदी की चुनौती और स्वदेशी का संकल्प

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पूरे विवाद पर आक्रामक लेकिन आत्मविश्वासी प्रतिक्रिया दी है। अहमदाबाद में सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत किसी भी बाहरी दबाव को झेलेगा और किसानों, पशुपालकों तथा लघु उद्योगों के हितों की रक्षा करना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। उनके शब्दों में—‘‘मेरे लिए किसानों, पशुपालकों और छोटे उद्योगों के हित सर्वोपरि हैं। दबाव बढ़ सकता है, पर हम सब सह लेंगे।’’

अगले दिन गुजरात में एक अन्य भाषण में मोदी ने ‘‘स्वदेशी’’ की अपनी परिभाषा विस्तार से रखी। उन्होंने कहा—‘‘मेरे लिए स्वदेशी का मतलब बहुत सरल है। मुझे परवाह नहीं कि पैसा डॉलर का है या पाउंड का, मुझे यह देखना है कि पसीना और मेहनत भारतीय होनी चाहिए।’’ यह बयान उनके लंबे समय से चले आ रहे आर्थिक राष्ट्रवाद और आत्मनिर्भरता की नीति से मेल खाता है, जिसे कोविड महामारी के दौरान ‘‘आत्मनिर्भर भारत’’ अभियान के तहत नए आयाम दिए गए थे।

मोदी के इन बयानों का समय भी महत्वपूर्ण है। वे इस व्यापारिक झटके को आर्थिक राष्ट्रवाद के लिए जनसमर्थन जुटाने के अवसर के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। ‘‘स्वदेशी’’ का विचार भारत की स्वतंत्रता आंदोलन में औपनिवेशिक आर्थिक वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक रहा है। आज जब वही शब्द अमेरिका के साथ व्यापारिक विवाद में प्रयोग हो रहा है, तो यह न सिर्फ़ राजनीतिक रणनीति है बल्कि घरेलू स्तर पर यह संदेश भी है कि सरकार जनता के हितों के साथ खड़ी है।

किसानों, पशुपालकों और लघु उद्योगों पर अमेरिकी शुल्कों का सीधा असर भले न पड़े, लेकिन परोक्ष प्रभाव ज़रूर होगा। उदाहरण के लिए, अगर कुछ कृषि उत्पादों या कपड़ा निर्यात पर असर पड़ा तो ग्रामीण आजीविका प्रभावित हो सकती है। मोदी ने इन्हें स्पष्ट रूप से उल्लेख करके यह संकेत दिया है कि सरकार इन क्षेत्रों के लिए मुआवज़ा या सहायक नीतियाँ ला सकती है।

साथ ही, ‘‘स्वदेशी’’ का आह्वान भारत की उस दीर्घकालिक महत्वाकांक्षा से भी जुड़ा है जिसमें देश को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने और आयात पर निर्भरता घटाने की कोशिश हो रही है। पिछले वर्षों में सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ लागू की हैं। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना और भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में चीन के विकल्प के रूप में स्थापित करना है। अमेरिकी शुल्क भले ही तत्काल चुनौती बने हों, लेकिन यह परिस्थिति भारत की आत्मनिर्भरता की राह को और गति दे सकती है।

हालाँकि, इससे भारत-अमेरिका संबंधों पर गहरे प्रभाव पड़ना तय है। दशकों से दोनों देशों ने आतंकवाद-रोधी सहयोग, हिंद-प्रशांत क्षेत्रीय सुरक्षा और चीन के प्रभाव को संतुलित करने के साझा हितों पर साझेदारी बनाई है। व्यापार विवाद हमेशा मौजूद रहे हैं, लेकिन अब तक इन्हें अलग रखते हुए अन्य क्षेत्रों में प्रगति होती रही। मगर ताज़ा शुल्क विवाद ने इस भरोसे को हिला दिया है।

टैरिफ़ की समय सीमा से दो दिन पहले दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने वर्चुअल बैठक कर व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी सहयोग पर चर्चा की थी। साथ ही उन्होंने रक्षा साझेदारी के नए 10 वर्षीय ढाँचे की प्रगति की समीक्षा भी की। यह बैठक औपचारिक रूप से सकारात्मक रही, लेकिन वास्तविकता यह है कि दोनों लोकतंत्र साझा दृष्टिकोण की बात करते हुए भी व्यापार और आर्थिक नीतियों पर तीखे मतभेदों में उलझे हुए हैं।

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