बंदर या इंसान, आतंक किसका? पढ़िए ड़ा. ललित योगी की लिखी कविता ‘हमारे पेड़ रेंत दिए’
हमारे पेड़ रेंत दिए
हमारे पेड़ रेंत दिए
पहाड़ भी खोद दिए।
घर थे हमारे वहां,
इन्होंने जला दिए।।
जिसे दुर्गम कहते थे,
वहां रिसोर्ट खुल गए।
जो जगह बची थी,
उसमें फ़ास्ट फ़ूड सेंटर खुल गए।।
कहीं नदियों के किनारे,
तो कहीं जंगलों के बीच
हरदिन एडवेंचर कैम्प,
लोगों ने लगा दिए।
जैसे तैसे रहते थे हम,
वहां भी खुद धमक गए।
जंगल बचे भी थे कहीं,
वहां भी ये आ धमक गए!
कटखने बंदरों का आतंक,
कहकर हमको गलिया रहे।
शहर की तरफ क्या आये हम!
इन्होंने हजार मुद्दे बना दिये।
डॉ. ललित योगी
