डा. ललित योगी की लिखी चुनिंदा कविताओं का संग्रह

तीन माह की उपज कहूँ या फिर कहूँ मन की आवाज। तीन माह से शब्दों का ज्वार कुछ यूं निकला। ये महज शब्द नहीं हैं। इन पंक्तियों में मेरी छवि है। ये कीमती भाव हैं, जो बिना किसी अवरोध के आज परिष्कृत रूप में आपके समक्ष हैं।

1.
जीवन का सार

बिसरी सी तस्वीर और
खोया सा किरदार मेरा।
एक उलझी हुई डोर मेरी,
एक छोटा सा संसार मेरा।।
एक भूला भूला रस्ता है,
मैं राही हूँ उस पथ का।
जैसा भी हूँ अच्छा हूँ,
यही जीवन का सार मेरा।।
डॉ. ललित योगी

          2.

नदियां हत्यारन कैसे हुई?

नदियां नहीं उजाड़ती आशियाने!
नदियों के मुहाने-किनारे पर।
उगे हुए ईंट कंकड़ों के जंगल,
रोकते हैं नदियों के वेग को।
अपने साथ लाई गाद-मिट्टी को,
बिछाती है मुहाने-किनारे पर
इंसान बना देते हैं उन जगहों में,
अपने आलीशान आशियाने।
नदियां जब अपने पूर्वपथ पर,
निरंतर आगे बढ़ती-बहती है।
वो बंद किये हुए मुहाने देख,
ढूंढती और खोजती है रास्ता।।
अपने पथ पर अतिक्रमण देख,
दिखाती है भयावह रौंद्ररूप।
और रौंदकर चली जाती है,
इंसानों के बसाए घरौंदे को।।
इंसान नदियों को कोसते हैं,
पर वो ये नहीं देखते-
उसके पथ पर उगाए गए,
ईंट-कंकड़ों के अनगिनत जंगल।
लोग नदी को हत्यारन, डायन
और काल कहकर कोसते हैं!
नदियां जब जीवनदायिनी हैं,
तो फिर वो हत्यारन कैसे हुई?

3

कविता: कल और आज

कभी समंदर सी गहरी होती थी कविता,
अब बेसिर पैर की बात हो गई कविता।।
समुद्रमंथन के अमृत सी होती थी कविता,
आज फेसबुकिया हो गयी है कविता।।
एक दर्शन, गहन चिंतन होती थी कविता
आज हीही हुहु, हाहा हो गयी है कविता।
कुछ भी लिखकर जहां तहां दिख रही कविता
दाल भात सी हो गयी है अब कविता।।
डॉ. ललित योगी

4
चुप्पी

वीरान से जंगल में
फूल खिलाने आओ
व्यथित हुआ हूँ,
संगीत सुनने आओ।
कोरी-कोरी बातों से,
मेरा मन लगता नहीं
बहुत देर से बैठा हूँ
चुप्पी तोड़ने आओ।।

5.
जिंदगी

दो पल की जिंदगी है,
दो पल मैं भी जी रहा।
किराए के घर सी ये,
न है तेरा न है मेरा।।
मिट्टी से हम और
मिट्टी में मिल जाएंगे।
जो भी कुछ है यहां,
सब यहीं रह जायेगा।।
दो पल की…

६.
कौन हूँ?

न मित्र मेरा,न शत्रु मेरे,
न अपने और न ही पराए।
न आस और न याद कोई,
मन में नहीं सद्भाव कोई।।
न प्रेम मुझे,न आसक्त हूँ
हर बंधनों से मैं मुक्त हूँ।
खुद से ही अब पूछता हूँ,
अख्खड़ जोगी सा कौन हूँ?

7
मैं वक़्त

मैं वक़्त हूँ बीतता चला जाऊंगा,
नदी सा हूँ मैं बहता ही जाऊंगा ।
कीमती याद हूँ, बीते हुए दिनों की,
याद रखना! ओझल हो जाऊंगा।।
घर के आंगन में उगी तुलसी सा,
अपनी महक बिखेर जाऊंगा।।
संभालना तुम मुझे साथिया,
हवा हूँ, हवा सा बिखर जाऊंगा।

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