समाज-व्यवस्थाएं टूट रही हैं
डाॅ0 ललित चंद्र जोशी ‘योगी‘
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, सोबन सिंह जीना परिसर, अल्मोड़ा
समाज बिखर रहा है, सामाजिक समस्याओं से समाज ग्रसित है और सामाजिक ताना-बाना भी टूट रहा है। समाज की व्यवस्थाएं और कानून बिगड़ रही हैं। हालिया एक-दो दशकों में समाज की स्थिति बहुत बदली हंै। इसके बारे में चिंतन करें तो हमें कई प्रकार की समस्याएं सामने दिखाई पड़ती हैं, जैसे-परिवारों का विखण्डन, संयुक्त परिवारों में बुजुर्ग की अवहेलना, संस्कारों का खोना, अश्लीलता, भौंडापन। यह केवल एक क्षेत्र की समस्या नहीं है। वरन् यह समूचे भारतीय समाज की बात है। जबकि हमारे भारतीय समाज और व्यवस्थाएं बहुत उत्कृष्ट रही हैं। मीडिया के माध्यम से ज्ञात हा रहा है कि समाज की व्यवस्थाओं को तोड़ने वाले दोषियों, अपराधियों को अब अपने किए का पछतावा नहीं है। वे अपराध पर अपराध किए जा रहे हैं। वे अपने चरित्र को रस्खलित कर रहे हैं। क्या वाकई दोषियों और अपराधियों को कानून का भय नहीं है? यह सोचने का गंभीर विषय है।
किसी भी समाज और देश का विकास तब संभव है जब समाज अपराधमुक्त हो, जब समाज में किसी प्रकार की व्याधियां न हों। हम विकसित भारत-2047 बनाने के लिए अपना योगदान देने की बात कर रहे हैं, लेकिन क्या इन व्याधियों के रहते-रहते यह देश विकसित भारत बन पाएगा? ऐसे में हम किस बेहतर समाज की कल्पना कर रहे हैं? गत दिनों देश की एक बालिका को बहला-फुसलाकर जंगल ले जाया गया, जहां पांच युवकों ने दुष्कर्म कर उस बालिका की हत्या कर दी। इस घटना की वीडियो सोशल मीडिया में न्याय की गुहार लगा रही है। अपराध करने में पुरुष भी पीछे नहीं है और महिला भी। आज कई ऐसी महिलाएं हैं जो अपने पतियों को किसी-न-किसी बहाने से मार रही हैं। गत माह के कई ऐसी घटनाएं हैं जिनको देखकर समाज की असली हकीकत समझ आ जाती है। अब पतियों को घूमने के बहाने चट्टानों से फेंक दिया जा रहा है, मार-काट कर नीले ड्रम में डालकर सीमेंट से पाट दिया जा रहा है, बाथरूम में गाढ कर फर्श बना दिया जा रहा है, सांपों से डंसा जा रहा है, नशीली दवाओं से मार दिया जा रहा है। क्या यह आदर्श महिलाएं हैं? क्या महिलाओं की यह हरकत समाजविज्ञानियों को सोचने के लिए मजबूर नहीं करती? सोशल मीडिया में कई घटनाओं की ऐसी सूचनाएं हैं जो वाकई में बहुत डरावनी हैं, जो समाज में हो रहे बदलाव, रस्खलन, व्यवस्थाओं के शिथिलपन की ओर ईशारा करती है। समाज में नग्नता, अश्लीलता हावी हो रही है। युवा इनके जाल में फंस रहे हैं। गत दिनों जंतर मंतर में युवाओं के हाथ में जो तख्तियां दिखाई दी, उनमें भद्दी गालियां, अश्लील वाक्य को रोष के तौर पर देखा गया। क्या इन युवाओं से विकसित भारत की कल्पना की जा सकती है? क्या अभिभावकों को अपने बच्चों पर जोर नहीं है? क्या अभिभावक अपने बच्चों की परवरिश ढंग से नहीं कर पा रहे हैं? यह अभिभावकों की जिम्मेदारी है जिसे उन्हें भली-भांति समझना होगा। एक समय वह भी था जब मुंह से गालियां निकालना पाप समझा जाता रहा है लेकिन अब युवक-युवतियां रील बनाने के चक्कर में अश्लील वाक्य बोल रहे हैं, उन्हें अश्लील वाक्य बोलने का किसी भी प्रकार से भय नहीं है, उन्हें समाज का भय नहीं है, उन्हें अपने पड़ोस का भय नहीं हैं, उन्हें पुलिस का खौंफ नहीं है। इन सबके अलावा अब पास-पड़ोस में भी रहने लायक नहीं रहा है। अब बच्चियों के साथ अश्लील ईशारे करने में पड़ोसी भी पीछे नहीं है। अब पड़ोस में ही दुष्कर्म की घटनाएं बढ़ने लगी हैं, जबकि ग्रामीण समाज में हमने देखा है कि पास-पड़ोस में हो रही अच्छी-बूरी घटनाओं का संज्ञान बड़े-बुजुर्ग लिया करते थे। पड़ोस में रहने वाला कोई भी बच्चा जब गलत संगत में फंसता था तो पड़ोस का बुजुर्ग एक बड़े होने के नाते उन बच्चों को डांट फटकार कर सुधारने का प्रयास करता था। आज यदि किसी को सुधारने के लिए डांट-फटकार लगाएंगे तो या तो हत्या हो जाएगी और या फिर एफआईआर दर्ज। अब समाज व्यवस्थाएं शिथिल हो रही हैं, अब समाज में नई समस्याएं घिर आई हैं। मीडिया निरंतर इन समस्याओं को दिखा रहा है लेकिन समाज विज्ञानियों को इन समस्याओं पर चिंतन करने की आवश्यकता है। उन्हें इनके कारणों को वैज्ञानिक ढंग से खोजकर सुझाव प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। अन्यथा हम बेहतर समाज नहीं बना पाएंगे।
